सोलह सोमवार व्रत कथा | Solah Somvar Vrat Katha

आज हम इस ब्लॉग पोस्ट में सोलह सोमवार व्रत कथा ( Solah Somvar Vrat Katha ) के बारे में जानेंगे। सोमवार को शिवजी का दिन माना जाता है और इस दिन को भगवान शिव की पूजा-अर्चना और व्रत करने से बहुत बड़ा फल मिलता है। सोलह सोमवार व्रत को करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं और व्यक्ति को धन, समृद्धि, और सुख-शांति की प्राप्ति होती है।

16 सोमवार व्रत की विधि

16 सोमवार व्रत भगवान शिव को समर्पित है और इस व्रत को करने से भक्त की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। यह व्रत विशेष रूप से संतान सुख की प्राप्ति के लिए किया जाता है। इस व्रत को श्रावण मास के सोमवार से शुरू करके 16 सोमवार तक नियमित रूप से किया जाता है। इस व्रत की विधि निम्नलिखित है:

सोमवार व्रत की सामग्री:

  • भगवान शिव की मूर्ति या शिवलिंग
  • बिल्वपत्र, धातूरा, और केवड़ा के पुष्प
  • गंगाजल
  • दीपक, दीया, और घी
  • पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, और गुड़)
  • फल, फूल, और नैवेद्य
  • अगरबत्ती और धूप
  • माला, चंदन, कुमकुम, और अक्षता

सोमवार व्रत की विधि:

  1. पहले सोमवार को उठकर स्नान करें और साफ-सुथरे कपड़े पहनें।
  2. इसके बाद भगवान शिव की मूर्ति या शिवलिंग की पूजा के लिए एक साफ पूजा स्थल तैयार करें।
  3. शिवलिंग को गंगाजल से स्नान कराएं और पंचामृत से स्नान कराएं।
  4. उसके बाद शिवलिंग पर बिल्वपत्र, धातूरा, और केवड़ा के पुष्प चढ़ाएं।
  5. दीपक, दीया, और घी से आरती करें।
  6. भगवान शिव को फल, फूल, और नैवेद्य समर्पित करें।
  7. माला, चंदन, कुमकुम, और अक्षता से भगवान शिव की पूजा करें।
  8. इसके बाद 16 सोमवार तक व्रत के नियमित रूप से अपने मन और शरीर की शुद्धि बनाएं। इस दौरान सत्संगति का ध्यान रखें और शिवजी की भक्ति में लीन रहें।
  9. 16 सोमवार के व्रत के अंत में, आखिरी व्रत के दिन विशेष भक्ति भाव से भगवान शिव की पूजा करें और अपनी मनोकामनाएं मांगें।
  10. व्रत के अंत में, भगवान शिव का ध्यान करें और उनकी कृपा की प्रार्थना करें।

इस तरह, सोमवार के व्रत का पालन करके भगवान शिव की कृपा प्राप्त कर सकते हैं और संतान सुख, समृद्धि, और सुख-शांति की प्राप्ति कर सकते हैं। यह व्रत भगवान शिव के भक्तों के लिए विशेष महत्वपूर्ण है और इसे नियमित रूप से करने से उन्हें अनेक आशीर्वाद मिलते हैं।

सोलह सोमवार व्रत कथा ( Solah Somvar Vrat Katha ): प्रथम

एक दिन, एक साधू ऋषि गांव में आए। उन्होंने गांव के लोगों को शिवजी की कथाएं सुनाईं और सोमवार के महत्व का वर्णन किया। साधू ऋषि ने बताया कि सोमवार को व्रत करके भगवान शिव की कृपा प्राप्त की जा सकती है और सभी संकटों से मुक्ति मिल सकती है।

एक संतानहीन विधवा औरत भी उन्हें सुनते हुए बहुत प्रभावित हुई। उसका मन भगवान शिव की भक्ति में लीन हो गया और उसने सोलह सोमवार व्रत करने का संकल्प किया। वह अपने गांव के आश्रम में व्रत रखने की तैयारी करने लगी।

पहले सोमवार को व्रत करने पर उसे बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। लेकिन उसने अपने मन को दृढ़ता से बांधा और व्रत का पालन किया। उसने सोमवार को शिवजी की पूजा-अर्चना करी और उन्हें बिल्वपत्र, धातूरा, और केवड़ा अर्पित किया। उसने भक्ति भाव से भगवान शिव का ध्यान किया और मन में उनकी आराधना की।

सोलह सोमवार के व्रत का पालन करते-करते, विधवा औरत की भक्ति और श्रद्धा बढ़ती गई। उसके मन को चिन्हित किया गया और उसने धन्यवादी होकर भगवान शिव का ध्यान किया। उसे अपने जीवन में आनंद और सुख की प्राप्ति होती है और उसकी संतानहीनता भी खत्म हो जाती है।

इस तरह, संतानहीन विधवा औरत के सोलह सोमवार के व्रत के परिणामस्वरूप, उसे भगवान शिव की कृपा मिली और उसके जीवन में सभी सुखों की वर्षा हुई। उसकी संतानहीनता की समस्या भी खत्म हो गई और उसे एक सुखी और समृद्ध जीवन प्राप्त हुआ।

16 सोमवार व्रत कथा ( 16 Somvar Vrat Katha ): दुर्तीय

भगवान शिव अपनी पत्नी पार्वती के साथ एक बार मृत्युलोक की अमरावती नगर में गए। उस नगर के राजा ने विशाल शिव मंदिर बनाया था।शिव और पार्वती ने उस मंदिर में निवास करने लगा।एक दिन पार्वती ने भगवान शिव से कहा, “हे प्राणनाथ! आज मेरी चौसर खेलने की इच्छा हो रही है।”’ शिव ने पार्वती की इच्छा को जानकर उसके साथ चौसर खेलने बैठ गए। खेल शुरू होते ही मंदिर का पुजारी वहां पहुंचा। माता पार्वती ने पुजारी से पूछा कि इस मुकाबले में किसकी जीत होगी?

तो ब्राह्मण ने कहा कि भगवान ने किया। लेकिन चौसर में माता पार्वती जीत गईं और शिवजी पराजित हुए। तब उन्होंने ब्राह्मण को झूठ बोलने के अपराध में कोढ़ी देने का श्राप दे दिया। उस मंदिर से शिव और पार्वती कैलाश पर्वत पर वापस आए। पार्वती जी का श्राप पुजारी को कोढ़ी बनाया। नगरवासी भी उस पुजारी की परछाई से दूर रहने लगे। राजा ने पुजारी को कोढ़ी होने की शिकायत की तो उसे किसी पाप के कारण मंदिर से निकाल दिया। उसके स्थान पर एक और ब्राह्मण को पुजारी बनाया गया। मंदिर के बाहर बैठकर कोढ़ी पुजारी भिक्षा माँगने लगा।

कई दिनों के बाद, स्वर्ग की कुछ अप्सराएं उस मंदिर में पहुँचीं और उसे देखा और कारण पूछा। पुजारी ने उन्हें भगवान शिव और पार्वती के चौसर खेलने और पार्वती को शाप देने की पूरी कहानी सुनाई। उस समय अप्सराओं ने पुजारी से सोलह सोमवार को विधिवत व्रत रखने की मांग की।

अप्सराओं ने पुजारी से पूजन विधि पूछने पर कहा, “सोमवार के दिन सूर्योदय से पहले उठकर, स्नान करके, स्वच्छ वस्त्र पहनकर, आधा सेर गेहूँ का आटा लेकर उसके तीन अंग बनाना।”फिर घी का दीपक जलाकर गुड़, नैवेद्य, बेलपत्र, चंदन, अक्षत, फूल, जनेऊ सहित भगवान शिव की पूजा करना।आप पूजा करने के बाद तीन अंगों में से एक भगवान शिव को देकर दूसरा ग्रहण करें। शेष दो भागों को भगवान का वरदान मानकर वहाँ उपस्थित सभी को बाँट देना। यह व्रत करते हुए सोलह सोमवार बीत जाएँ तो सत्रहवें सोमवार को एक पाव आटे की बाटी बनाकर उसमें घी और गुड़ मिलाकर चूरमा बनाना।फिर भगवान शिव को भोग लगाकर उपस्थित सभी को भोजन देना। भगवान शिव को सोलह सोमवार व्रत करने और व्रतकथा सुनने से आपका कोढ़ दूर होगा और आपकी सभी मनोकामनाएँ पूरी होंगी। इसके बाद अप्सराएं स्वर्ग चली गईं।

अप्सराओं के अनुसार पुजारी ने सोलह सोमवार का विधिवत व्रत रखा। भगवान शिव की कृपा से उसका कोढ़ नष्ट हो गया। बाद में राजा ने उसे मंदिर का पुजारी बनाया। मंदिर में भगवान शिव की पूजा करते हुए वह खुशी-खुशी जीवन जीने लगा।

कुछ दिनों बाद, भगवान शिव और पार्वती फिर से पृथ्वी पर घूमते हुए उस मंदिर में आए। पार्वती ने पुजारी को स्वस्थ देखकर आश्चर्य से उसके रोग से छुटकारा पाने का कारण पूछा. पुजारी ने उन्हें सोलह सोमवार की पूरी कथा बताई।

देवकी भी व्रत की बात सुनकर बहुत खुश हुईं और पुजारी से Solah Somvar Vrat Katha पूछा। उन दिनों पार्वती जी को अपने पुत्र कार्तिकेय के नाराज होकर चले जाने की बहुत चिंता हुई। वे कार्तिकेय को वापस लाने के लिए बहुत कुछ कर चुके थे, लेकिन कार्तिकेय वापस नहीं आया। पार्वती ने सोलह सोमवार का व्रत करते हुए भगवान शिव से कार्तिकेय के वापस आने की प्रार्थना की। कार्तिकेय वास्तव में व्रत के तीसरे दिन वापस आया। “हे माता! आपने ऐसा कौन-सा उपाय किया था, जिससे मेरा क्रोध नष्ट हो गया और मैं वापस लौट आया?” कार्तिकेय ने पार्वतीजी से अपने हृदय-परिवर्तन के बारे में पूछा।तब पार्वती ने कार्तिकेय को Solah Somvar Vrat Katha बताया।

अपने ब्राह्मण मित्र ब्रह्मदत्त के चले जाने से कार्तिकेय बहुत दुखी थे। कार्तिकेय ने Solah Somvar Vrat Katha रखकर ब्रह्मदत्त को वापस लाने की इच्छा व्यक्त की। मित्र कुछ दिनों बाद वापस आया। “प्रिय मित्र! तुमने ऐसा कौन-सा उपाय किया था जिससे परदेस में मेरे विचार एकदम परिवर्तित हो गए और मैं तुम्हारा स्मरण करते हुए लौट आया?” कार्तिकेय ने ब्राह्मण से पूछा।’ साथ ही कार्तिकेय ने अपने दोस्त को सोलह सोमवार के व्रत की कहानी बताई। ब्राह्मण मित्र व्रत सुनकर बहुत खुश हो गया। उसने व्रत भी रखा।

सोलह सोमवार का व्रत पूरा करने के बाद ब्रह्मदत्त विदेश चला गया। वहाँ राजकुमारी गुंजन, नगर के राजा राजा हर्षवर्धन की बेटी का स्वयंवर हो रहा था। राजा ने कहा कि जो हथिनी यह माला उसके गले में डालेगी, उसी से अपनी पुत्री का विवाह करेगा।

ब्राह्मण भी उत्सुकता से महल में गए। कई राज्यों के राजकुमार वहाँ बैठे थे। वह अचानक वहां आई और एक सजी-धजी हथिनी सूँड में जयमाला लिए आई। ब्राह्मण ने हथिनी के गले में जयमाला डाल दी। नतीजतन, राजकुमारी ब्राह्मण से विवाह कर दी गई।

उसकी पत्नी ने एक दिन पूछा, “हे प्राणनाथ! आपने कौन-सा शुभ कार्य किया जो उस हथिनी ने राजकुमारों को छोड़कर आपके गले में जयमाला डाल दी?”ब्राह्मण ने सोलह सोमवार के व्रत की प्रक्रिया बताई। राजकुमारी ने अपने पति से सोलह सोमवार का महत्व जानकर पुत्र की इच्छा से सोलह सोमवार को व्रत रखने का फैसला किया। राजकुमारी को उचित समय पर भगवान शिव की कृपा से एक सुंदर, सुशील और स्वस्थ पुत्र हुआ। पुत्र का नाम गोपाल था।

बड़ा होने पर, पुत्र गोपाल ने एक दिन मां से पूछा कि मैंने अपने ही घर में जन्म लिया क्यों? माता गुंजन ने अपने बेटे को सोलह सोमवार के व्रत का पता लगाया। गोपाल ने व्रत का महत्व जानकर भी व्रत करने का निश्चय किया। गोपाल ने सोलह सोमवार को राज्य पाने की इच्छा से विधिवत व्रत किया। विधि पूरी होने पर गोपाल एक घूमने के लिए निकट के शहर में गया। गोपाल को वहां के वृद्ध राजा ने पसंद किया और गोपाल के साथ अपनी पुत्री राजकुमारी मंगला का विवाह कर दिया। सोलह सोमवार का व्रत करने के बाद गोपाल महल में आकर खुश हो गया।

गोपाल को दो वर्ष बाद उस नगर का राजा बनाया गया। गोपाल की राज्य पाने की इच्छा इस तरह पूरी हुई, सोलह सोमवार व्रत करने से। वह राजा बनने के बाद भी Solah Somvar Vrat रखता था। सत्रहवें सोमवार को, गोपाल ने अपनी पत्नी मंगला को बताया कि वह पूजा की सारी सामग्री लेकर निकट के शिव मंदिर में जाएगा।

पति की आज्ञा का उल्लंघन करते हुए, सेवकों ने पूजा की सामग्री मंदिर में भेजी। मैं खुद मंदिर नहीं गया। जब राजा ने भगवान शिव को अर्पित किया, आकाशवाणी ने कहा, “हे राजन्! तेरी रानी ने Solah Somvar Vrat Katha का अनादर किया है।” तुम्हारी पूरी संपत्ति बर्बाद हो जाएगी अगर आप रानी को महल से बाहर निकाल नहीं देते। उसने आकाशवाणी सुनते ही महल में पहुंचकर अपने सैनिकों को रानी को दूर किसी नगर में छोड़ने का आदेश दिया।´ राजा की आज्ञा पर सैनिकों ने उसे तुरंत घर से निकाल दिया। भूखी-भूखी रानी उस नगर में भटकने लगी। उस नगर में रानी को एक बुढ़िया मिली। वह बुढ़िया सूत कातने जा रही थी, लेकिन सूत उठ नहीं रहा था। “बेटी! यदि तुम मेरा सूत उठाकर बाजार तक पहुंचा दो और सूत बेचने में मेरी मदद करो तो मैं तुम्हें धन दूंगी,” बुढ़िया ने रानी से कहा।’

राजकुमारी ने बुढ़िया की बात सुनी। लेकिन रानी ने सूत की गठरी पर हाथ रखते ही एक तीव्र आंधी चली, जिसके कारण सूत पूरी तरह से आंधी में उड़ गया। बुढ़िया ने उसे धक्का देकर भागा। यात्रा करते हुए रानी एक तेली के घर पहुंची। तेली ने गुस्से में रानी को घर में रहने को कहा. लेकिन भगवान शिव के क्रोध से तेली के तेल के मटके एक-एक करके फूटने लगे। तेली भी भागा।

वह भूखी-प्यास से वहां से आगे की ओर चली गई। जब रानी ने एक नदी पर जल पीकर अपनी प्यास को शांत करना चाहा, तो जल सूख गया। रानी अपने भाग्य को कोसती हुई आगे चली।रास्ते में रानी एक जंगल में पहुँची। उस वन में तालाब था। उसमें शुद्ध जल था। रानी को निर्मल जल देखकर प्यास लगी। रानी ने जल पीना शुरू किया और तालाब की सीढ़ियां उतरते ही बहुत सारे कीड़े उस जल में आ गए। दुखी होकर रानी ने उस गंदे जल को पीकर अपनी प्यास बुझाई।

जब रानी ने एक पेड़ की छाया में बैठकर कुछ समय बिताना चाहा, तो उस पेड़ के पत्ते तुरंत सूख गए और बिखर गए। रानी एक और पेड़ के नीचे बैठ गई, क्योंकि उसे उस पेड़ के नीचे बैठना सबसे अच्छा लगता था।

वन और सरोवर की यह स्थिति देखकर वहां के ग्वाले बेहोश हो गए। रानी को पास के मंदिर में एक पुजारी के पास ग्वाले ले गए। रानी के चेहरे को देखकर पुजारी को पता चला कि वह निश्चित रूप से एक बड़े घर की निवासी है। भाग्य की वजह से दर-दर बदल रही है।

रानी को पुजारी ने कहा, “पुत्री! तुम कोई चिंता नहीं करो।” इस मंदिर में मेरे साथ रहो। सब कुछ कुछ दिनों में बेहतर हो जाएगा।’ पुजारी ने रानी को बहुत सांत्वना दी। रानी उस मंदिर में रहने लगी. भोजन बनाते समय, सब्जी जल जाती और आटे में कीड़े पड़ जाते थे। जल की बदबू आने लगती है। रानी के दुर्भाग्य को देखते हुए पुजारी ने कहा, “हे पुत्री! अवश्य ही तुझसे कोई अनुचित काम हुआ है जिसके कारण देवता तुझसे नाराज हैं और उनकी नाराजगी के कारण ही तुम्हारी यह हालत हुई है।” पुजारी की बात सुनकर रानी ने शिव की पूजा नहीं करने की पूरी कहानी बताई।

“अब तुम कोई चिंता नहीं करो,” पुजारी ने कहा।कल सोमवार है, इसलिए तुम कल से Solah Somvar Vrat Katha करना शुरू कर दो। भगवान शिव आपके दोषों को अवश्य माफ करेंगे।’ रानी ने पुजारी की बात मानकर सोलह सोमवार का व्रत लिया। सोमवार का व्रत करने के बाद रानी ने शिव की पूजा की और व्रतकथा सुनने लगी। रानी ने सत्रहवें सोमवार को अपना विधिवत व्रत पूरा किया, तो उसके पति राजा को रानी की याद आई। राजा ने अपने सेनापतिओं को रानी को खोजने और लाने के लिए तुरंत भेजा। सैनिक मंदिर में रानी को खोजते हुए आए और उसे वापस चलने के लिए कहा। सैनिक निराश होकर लौट गए जब पुजारी ने उनसे मना कर दिया। लौटकर वे सब कुछ राजा को बताया।

राजा स्वयं मंदिर में पुजारी से मिले और रानी को महल से निकालने के लिए उनसे माफी माँगी। राजा ने पुजारी से कहा, “यह सब भगवान शिव के प्रकोप से हुआ है।” ऐसा कहकर रानी से विदा हुई।

रानी राजा के साथ महल में पहुंची। महल बहुत खुश था। पूरी नगरी सजाई गई। राजा ने ब्राह्मणों को धन, कपड़े और अन्न देते थे। नगर में गरीब लोगों को कपड़े बांटे गए।

Solah Somvar Vrat लेकर रानी महल में खुश रहने लगी। उसका जीवन भगवान शिव की कृपा से भर गया।

सोलह सोमवार को व्रत करके कथा सुनने से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं और उसके जीवन में कोई कमी नहीं आती। स्त्री-पुरुष मोक्ष को प्राप्त करते हुए खुश रहते हैं।

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16 सोमवार व्रत की महिमा:

सोमवार को शिवजी का व्रत करने से व्यक्ति को अनेक लाभ मिलते हैं। व्रत करने से उन्हें समृद्धि, सुख, और संतान सुख की प्राप्ति होती है। भगवान शिव व्रत करने से भक्त के जीवन में शांति और सुख की वृद्धि होती है और वह अपने मन की सभी मनोकामनाएं पूरी कर सकता है।

सोलह सोमवार व्रत को करने से मनुष्य का मानसिक और आध्यात्मिक विकास होता है। वह ध्यान, तपस्या, और श्रद्धा से भगवान शिव की आराधना करता है और उनके प्रति अपनी भक्ति को प्रदर्शित करता है।

इसलिए, हम सभी सोलह सोमवार व्रत का पालन करके भगवान शिव की कृपा को प्राप्त कर सकते हैं और अपने जीवन में सुख, समृद्धि, और संतान सुख की प्राप्ति कर सकते हैं।

सोलह सोमवार का व्रत करने से क्या फल मिलता है?

सोलह सोमवार का व्रत करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और व्रत करने वाले को अनेक फल मिलते हैं। यह व्रत भगवान शिव के भक्तों के लिए विशेष महत्वपूर्ण है और इसका पालन करने से व्यक्ति की इच्छाएं पूरी होती हैं और उसे धन, समृद्धि, और सुख-शांति की प्राप्ति होती है।

Solah Somvar Vrat Katha के कुछ महत्वपूर्ण फल:

  1. संतान सुख की प्राप्ति: सोलह सोमवार का व्रत करने से संतानहीन जोड़े को संतान सुख की प्राप्ति होती है। भगवान शिव व्रत करने वालों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं और उन्हें संतान सुख का आशीर्वाद मिलता है।
  2. धन और समृद्धि: सोलह सोमवार का व्रत करने से व्यक्ति को धन और समृद्धि की प्राप्ति होती है। भगवान शिव के व्रत के पालन से व्यक्ति का आर्थिक स्थिति मज़बूत होता है और उसके जीवन में आर्थिक वृद्धि होती है।
  3. सुख-शांति की प्राप्ति: सोलह सोमवार के व्रत से व्यक्ति को सुख-शांति की प्राप्ति होती है। भगवान शिव के व्रत करने से व्यक्ति का मन शांत होता है और उसका जीवन सुखमय होता है।
  4. मानसिक शक्ति वृद्धि: सोलह सोमवार के व्रत का पालन करने से व्यक्ति की मानसिक शक्ति वृद्धि होती है। व्रत करने से व्यक्ति को आत्मविश्वास मिलता है और उसका मानसिक विकास होता है।
  5. आरोग्य: सोलह सोमवार का व्रत करने से व्यक्ति को आरोग्य और स्वस्थ्य की प्राप्ति होती है। व्रत करने से व्यक्ति के शरीर की ऊर्जा बढ़ती है और उसका शारीरिक स्वास्थ्य सुधारता है।
  6. दुर्भाग्य और दुर्गति का नाश: सोलह सोमवार का व्रत करने से व्यक्ति के दुर्भाग्य और दुर्गति का नाश होता है। व्रत करने से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मकता आती है और उसके सभी कष्ट दूर होते हैं।
  7. मुक्ति की प्राप्ति: सोलह सोमवार का व्रत करने से व्यक्ति को मुक्ति की प्राप्ति होती है। भगवान शिव के व्रत के पालन से व्यक्ति का मन मुक्ति की ओर जाता है और उसे आध्यात्मिक उन्नति होती है।

सोलह सोमवार व्रत में अक्सर पूछे जानेवाला प्रश्न (FAQs)

1. इस व्रत को किस अवसर पर किया जाता है?

यह व्रत आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष के सोमवार से शुरू होता है और 16 सोमवारों तक लगातार किया जाता है।

2. व्रत करने से क्या लाभ होते हैं?

व्रत के द्वारा व्रती को भगवान शिव का आशीर्वाद मिलता है और उन्हें सुख, समृद्धि, और सम्पूर्णता की प्राप्ति होती है।

3. व्रत के दौरान क्या पूजा की जाती है?

व्रत के दौरान व्रती भगवान शिव को गंगाजल से स्नान कराते हैं और उनकी पूजा करते हैं। व्रती धूप, दीप, फल, फूल, नैवेद्य आदि से भगवान शिव की पूजा करते हैं।

4. क्या व्रत के दौरान अन्य खाने-पीने की विधि होती है?

व्रत के दौरान व्रती को सात्विक और शुद्ध आहार लेना चाहिए और अन्य तमसिक और राजसिक आहार का त्याग करना चाहिए।

5. क्या व्रत की अनुष्ठान विधि भिन्न-भिन्न प्रांतों में अलग होती है?

हां, व्रत की अनुष्ठान विधि भिन्न-भिन्न प्रांतों में थोड़ी भिन्नता रखती है, लेकिन व्यापक रूप से इसकी अनुष्ठान विधि समान होती है। व्रती को व्रत विधियों का सख्ती से पालन करना चाहिए।

6. 16 सोमवार का व्रत कब खोलना चाहिए?

सावन माह के पहले सोमवार पर शुरू करना उत्तम माना गया है, इसके साथ चैत्र, मार्गशीर्ष और वैशाख मास के पहले सोमवार से भी इसे आरंभ कर सकते हैं ।

6. सोलह सोमवार का व्रत करने से क्या फल मिलता है?

Solah Somvar Vrat Katha को पूरी श्रद्धा एवं विधि विधान से करने से भोलेनाथ अत्यंत प्रसन्न होते हैं और मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

ध्यान दें: इस ब्लॉग पोस्ट में दी गई Solah Somvar Vrat Katha In Hindi और व्रत के महिमा से जुड़े सभी तथ्य हमारी धार्मिक अनुभूति और संस्कृति के आधार पर हैं। इस ब्लॉग पोस्ट के माध्यम से हम किसी भी व्यक्ति या संगठन को ठेस नहीं पहुंचाना चाहते हैं।

धन्यवाद सभी पाठकों को भगवान शिवजी की कृपा आप सभी पर बनी रहे। Solah Somvar Vrat Katha का पालन करें और भगवान शिव के आशीर्वाद से अपने जीवन को समृद्ध बनाएं।

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