Radha Ashtami Vrat Katha: जानिए व्रत कथा, पूजा विधि और महत्‍व

Radha Ashtami Vrat Katha: राधा अष्टमी, हिन्दू धर्म में एक महत्वपूर्ण पर्व है जो भगवान कृष्ण और उनकी प्रिय राधा के प्रेम के आदर्श को मनाने के लिए मनाया जाता है। इस व्रत की कथा, पूजा विधि, और महत्व के बारे में जानने के लिए, नीचे दी गई जानकारी पढ़ें।

Radha Ashtami Vrat Katha:

राधा अष्टमी के दिन का महत्व विशेष है, क्योंकि इसे भगवान कृष्ण की प्रिय राधा के जन्म दिन के रूप में माना जाता है। वेदों में कहा गया है कि राधा भगवान कृष्ण की आत्मा थी, और उनका प्रेम अद्वितीय था। इसी दिव्य प्रेम की महिमा को मनाने के लिए राधा अष्टमी को मनाया जाता है।

राधा अष्टमी व्रत कथा: Radha Ashtami Vrat Katha In Hindi

नमस्कार दोस्तों भाद्रपद मास में रविवार के दिन शुक्ल पक्ष की अष्टमी को आधीरात के समय जेष्ट नक्षत्र के चौथे चरण में श्री राधिका रानी का जन्म हुआ। इस विषय में एक सुंदर कथा आती है। एक समय महाराज वृषभानु स्नान करने के लिए यमुना नदी पर गयी। आसपास का वातावरण शांत था।मंद गति से सुगंधित वायु लहरा रही थी।

चिड़ियों की मधुर आवाज के बीच में महाराज फ्रेश भानु में एक सुंदर दृश्य देखा। उनसे कुछ ही दूरी पर यमुना नदी पर एक सुंदर स्वर्ण कमल का पुष्प तैर रहा था। स्वर्ण कमल उन्होंने पहली कभी नहीं देखा था, ना ही उसके बारे में उन्होंने कभी सुना था कौतूहलपूर्वक वो उस कमल के पुष्प के पास गयी।वहाँ जाकर उन्होंने देखा की उस कमल की पंखुड़ियों के बीच एक अत्यंत सुंदर और सुकोमल बालिका सोई हुई थी। उसका वर्ण पिघले हुए स्वर्ण के समान था।

नेत्र कमल की पंखुड़ियों के समान थी। इस बालिका को देखते ही महाराज के मन में बात सुनने की वर्षा होने लगी। उन्होंने उस कन्या को अपनी गोद में उठा लिया। आसपास देखा तो कोई भी नहीं था।इस प्रकार एक नवजात शिशु को किसने छोड़ा होगा? वो ऐसा विचार कर ही रहे थे कि तभी वहाँ ब्रह्मा जी प्रकट हुए और बोले ही वत्स तुमने और तुम्हारी पत्नी ने अनेकों वर्षों तक घोर तपस्या करी थी ताकि तुम भगवान श्री हरि की संगिनी को अपनी पुत्री के रूप में प्राप्त कर सकू और इस जनम में तुम्हारी इच्छा पूर्ण हुई है।

ये बालिका साक्षात् भगवान की अंतरंग शक्ति है। माता लक्ष्मी का प्राकट्य भी इन्हीं से हुआ है। जाओ इन्हें अपने घर ले जाओ और पूर्ण प्रेम, वात्सल्य और स्नेह से इनका पालन पोषण करूँ। ऐसा कहकर ब्रह्मा जी अंतर्ध्यान हो गए और महाराज वृषभानु के आनंद की कोई सीमा नहीं रही। पूर्ण हर्ष के साथ वो उस कन्या को अपने घर ले आयी।और अपनी पत्नी कीर्तिदा देवी को सारा प्रसंग कह सुनाया।

कीर्तिदा देवी भी इस नन्हीं सी बालिका को देखकर अत्यंत प्रसन्न हुईं। बीते समय के साथ राधिका रानी का सौंदर्य चंद्रमा की कलाओं के समान बढ़ने लगा। जो भी उन्हें दिखता वो बस देखता ही रह जाता। महाराज अत्यंत स्नेह और प्रेम के साथ अपनी इस बालिका का जतन कर रही थी।समय बाद एक समस्या आई ये नन्हीं सी बालिका रोती नहीं है और ना ही अपनी आंखें खोलती है। ऐसा लगता था मानो उसकी श्रवण शक्ति भी नहीं है।

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ये देखकर कीर्तिदा देवी और महाराज वृषभानु अत्यंत चिंतित रहने लगे। फिर क्या था उनकी इस समस्या का समाधान करने नारदमुनि आ पहुंची। उन्होंने महाराज वृषभानु को सुझाव दिया।यदि आप अपनी पुत्री के जन्म के उपलक्ष्य में एक समारोह का आयोजन करें और इस समारोह में अपने परम मित्र नन्द महाराज को परिवार सहित आमंत्रित जरूर करिये। फिर क्या था? समारोह के आयोजन की तैयारियां होने लगीं।

नन्द महाराज को विशेष आमंत्रण भेजा गया। अपने मित्र के निमंत्रण को स्वीकार करते हुए नन्द महाराज, यशोदा मैया और नन्हे कान्हा।बरसानी आ पहुंची। नन्ही कृष्ण को पता था कि उन्हें क्या करना है और कहा जाना है अपने घुँघरू खंड का ते। वो सीधे राधा रानी के पास पहुँच गए। जैसे ही श्रीकृष्ण नी पालने में सोई हुई राधा रानी की ओर देखा तो उनकी सुगंध से राधारानी जान गयी की उनके प्राणप्रिय श्रीकृष्ण आ गए हैं।

अत्यंत हर्ष के साथ उन्होंने अपनी आंखें खोलीं।और सर्वप्रथम भगवान श्रीकृष्ण का दर्शन किया और थोड़ी ही देर में वो रोने लगी। अपनी पुत्री को पहली बार नेत्र खोलें और रोते हुए देख कीर्तिदा देवी और महाराज वृषभानु अत्यंत हर्षित हुए। इस प्रकार उनके पुत्र के जन्म की प्रसन्नता दोगुनी हो गई। दोस्तों भगवान श्रीकृष्ण प्राण हैं तो राधारानी आत्मा हैं। जय जय श्री राधी।जय श्री कृष्ण।

राधा अष्टमी के महत्व:

राधा अष्टमी के दिन, भक्तगण व्रत करते हैं और राधा और कृष्ण के प्रेम की कथाएँ सुनते हैं। इस दिन को अपने जीवन में प्रेम और भक्ति के लिए आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है।

राधा अष्टमी पूजा विधि:

राधा अष्टमी के दिन, लोग सुबह उठकर नहाते हैं और फिर राधा और कृष्ण की मूर्ति को सजाते हैं। फूलों और धूप-दीपक के साथ पूजा की जाती है। फिर पूजा के बाद, भक्तगण व्रत की कथाओं को सुनते हैं जिन्हें विद्वानों या बड़ों द्वारा सुनाया जाता है। व्रत के दिन भोजन का त्याग किया जाता है, जो शरीर और मन को शुद्ध करने और दिव्य भक्ति को मजबूत करने का एक तरीका होता है।

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निष्कर्ष:

राधा अष्टमी के दिन का महत्व विशेष है, क्योंकि इसे भगवान कृष्ण की प्रिय राधा के जन्म दिन के रूप में माना जाता है। वेदों में कहा गया है कि राधा भगवान कृष्ण की आत्मा थी, और उनका प्रेम अद्वितीय था। इसी दिव्य प्रेम की महिमा को मनाने के लिए राधा अष्टमी को मनाया जाता है।

इस अद्वितीय कथा के माध्यम से आपने भगवान श्रीकृष्ण और श्री राधिका रानी के दिव्य सम्बंध का वर्णन किया है, जिससे भक्तों को उनके दिव्य लीला और प्रेम के प्रति और भी अधिक आकर्षित किया जा सकता है।

FAQs :

राधा अष्टमी का व्रत कब खोलना चाहिए ?
राधा अष्टमी का व्रत उसी दिन खोलना चाहिए जिस दिन यह व्रत रखा गया है। व्रत की आधिकारिक विधि के अनुसार, राधा अष्टमी का व्रत सुबह के समय शुरू किया जाता है और सुबह के समय ही खोला जाता है। इसका मतलब है कि आपको व्रत के दिन का नाश्ता और व्रत का अदिकांश भोजन सुबह करना होता है।

राधा अष्टमी की कहानी क्या है?
राधा अष्टमी का व्रत भगवान श्रीकृष्ण की परम प्रेमिका और भक्त राधारानी को समर्पित है, और इस व्रत का महत्व बहुत उच्च है। यह व्रत श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन भक्त राधारानी की पूजा और व्रत करते हैं और उनके गुणों का गुणगान करते हैं।

राधा जी किसकी पत्नी थी?
राधा जी भगवान श्रीकृष्ण की परम प्रेमिका थी।

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