Putrada Ekadashi Vrat Katha : पुत्रदा एकादशी व्रत कथा


Putrada Ekadashi Vrat Katha राधे राधे मेरे प्यारे भाइयों और बहनों, माताओं व बंधु आप सभी का स्वागत है “Ekadashi Vrat Katha” आज मैं आपको श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पुत्रदा एकादशी व्रत कथा श्रवण करवाने जा रही हूँ। इस दिन भगवान जनार्दन की श्रद्धापूर्वक पूजा की जाती है। भक्ति पूर्वक इस व्रत को करने से सभी कामनाओं की पूर्ति होती है। संतानप्राप्ति?इच्छा रखने वालों को यह व्रत अवश्य करना चाहिए।

पुत्रदा एकादशी व्रत कथा : Putrada Ekadashi Vrat Katha

श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकादशी कहा जाता है, जो मनुष्य भी चाहता है कि उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो। उनकी संतान को।हर क्षेत्र में तरक्की मिले। उनके बच्चों का भविष्य उज्वल हो और जिनके यहाँ संतान नहीं है उन्हें संतान की प्राप्ति हो, उन्हें पुत्रदा एकादशी व्रत अवश्य करना चाहिए। बोलो विष्णु भगवान की जय हो

पुत्रदा एकादशी व्रत कथा : Putrada Ekadashi Vrat Katha, भगवान श्रीकृष्ण।युधिष्ठिर से कहते हैं।हे युधिष्टर श्रावण शुक्ला एकादशी का नाम पुत्रदा है। मैं इसके बारे में एक प्राचीन कथा तुम्हें सुनाने जा रहा हूँ। जो कोई भी इस कथा को पड़ता है, यहाँ सुनता है उसे वाजपेयी यज्ञ का फल प्राप्त होता है। वहाँ पर युग के आरंभ में महिष्मती नगरी में महिजीत नाम का एक प्रतापी राजा राज्य करता था, उसका बहुत बड़ा राज्य था।

परन्तु उसके कोई पुत्र नहीं था। इस वजह से राजा महिजीत को राज्य सुखदायक नहीं लगता था। पुत्र प्राप्ति के लिए राजा ने अनेक दान, पुण्य, यज्ञ, हवन आदि उपाय किये परंतु राजा को पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई। पूरी अवस्था आती हुई देखकर राजा अपनी प्रजा के प्रतिनिधियों और विद्वान ब्राह्मणों को बुलाकर कहने लगा हे प्रजाजनों।

मैंने इस जनम में तो कोई पाप नहीं किया। मेरे खजाने में अन्याय से उपार्जन किया हुआ धन भी नहीं है और ना ही मैंने कभी देवमंदिरों सद्गृहस्थों अथवा ब्राह्मणों का धन छीना है। किसी दूसरे की धरोहर भी मैंने कभी नहीं ली और ना ही प्रजा पर अन्यायपूर्ण कोई कर लगाया है। मैं प्रजा का पुत्र के समान पालन करता हूँ तथा ब्राह्मणों और सन्यासियों को भरपूर दान देता हूँ। यद्यपि न्याय की रक्षा के लिए मैं अपराधियों को दंड देता हूँ।

परन्तु कभी किसी से घृणा नहीं की। सबको समान माना है। सज्जनों की सदा पूजा करता रहा हूँ। इस प्रकार धर्मयुक्त राज्य करते हुए भी मेरे पुत्र नहीं है, इस कारण मैं अत्यंत दुख पा रहा हूँ। इसका क्या कारण है? राजा महिजीत की इस समस्या के निवारण हेतु प्रजा के प्रतिनिधि तथा मंत्रीगण वन में जाकर बड़े बड़े ऋषियों और मुनियों के दर्शन करते हुए किसी विद्वान तपस्वी की तलाश में लग गयी।

एक आश्रम में उन्होंने एक अत्यंत वयोवृद्ध धर्म के ज्ञाता बड़े तपस्वी परमात्मा में मन लगाए हुए निराहार जितेंद्रीय जीत, आत्मा जीत, क्रोध, सनातन धर्म के गुण तत्वों को जानने वाले समस्त छात्रों के ज्ञाता महात्मा लोमश मुनि को देखा। एक क्लब के व्यतीत होने पर एक रोम गिरता था। लोमश ऋषि का इतनी अधिक थी उनकी आयु।सबने जाकर लोमेश ऋषि को प्रणाम किया और उनके सामने बैठ गई। उन्हें देखकर ऋषि ने पूछा कि आप लोग किस कारण से आये है? आप मुझे अपनी समस्या बताइए नी संदेह में आप लोगों का हित करूँगा।

लोमास ऋषि के ऐसे वचन सुनकर सब लोग बोले हे महाऋषि यद्यपि आप हमारी बात जानने में ब्रह्मा से भी अधिक समर्थ हैं मगर फिर भी हम अपनी व्यथा कहते हैं। महिष्मतिपुरी का धर्मात्माराजा महिजीत प्रजा का पुत्र के समान पालन करता है, परंतु फिर भी वह पुत्रहीन है। हम लोग उसकी प्रजा है।

अपने राजा के दुख से हम भी दुखी हैं। हम को पूर्ण विश्वास है कि आपके दर्शन से हमारा यह संकट अवश्य दूर हो जाएगा, क्योंकि महान पुरुषों के दर्शन मात्र से अनेक कष्ट दूर हो जाते हैं। आप कृपा करके राजा के पुत्र होने का उपाय बताएं? यह वार्ता सुनकर ऋषि लोमस नेथोड़ी देर के लिए अपने नेत्र बंद किये और राजा के पिछले जन्म का विस्तान याद किया। लोमेश ऋषि ने सुने है आसक्ति वाणी में कहा हे महानुभावों आपका राजा पूर्वजन्म में एक निर्धन वैश्य था।

निधन होने के कारण इसलिए अनेक बुरे कर्म किए। वह एक गांव से दूसरे गांव व्यापार करने के लिए जाया करता था। एक समय गेस्ट मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी के दिन मध्याह्न काल के समय जबकि वह 2 दिन का भूखा प्यासा था।एक जलाशय पर जल पीने गया। उस स्थान पर एक तत्काल वी आई गो जल पी रही थी। राजा ने उस प्यास ईगो को जल पीने से हटा दिया और स्वयं जल पीने लगा।

इसी पाप के कारण राजा को नी पुत्र होने का दुख सहना पड़ा है। एक काशी के दिन भूखा रहने से वह राजा बना और प्यास ईगो को जल पीने से हटाने के कारण पुत्र हीनता का दुख भोगना पड़ा है। सब लोगों ने कहा हे मुनिश्रेष्ठ राजा के इस पाप के निवारण का कोई उपाय हो तो बताइए।आते है राजा का ये पाप नष्ट हो? आप ऐसा कोई उपाय बताने की कृपा करें। लोमेश मुनि ने उत्तर दिया श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पवित्रा एकादशी का व्रत और रात्रि जागरण करें तो पूर्वजन्म का यह पाप नष्ट होकर राजा को अवश्य ही पुत्र की प्राप्ति होगी।

श्रृषि से उपाय जानने के बाद सभी व्यक्ति नगर को वापस लौटाए। जब श्रावण शुक्ला एक आई सबने मिलकर ऋषि की आज्ञा अनुसार राजा सहित पुत्रदा एकादशी का व्रत और जागरण किया। इसके पश्चात द्वादशी के दिन इसके पुण्य का फल राजा को दिया। उस पुण्य के प्रभाव से रानी ने गर्भ धारण किया और प्रसव काल समाप्त होने पर उसके एक बड़ा तेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुआ।

अंत में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा हे राजन् इस श्रावण शुक्ला एकादशी का नाम पुत्रदा एकादशी है अतः संतान के सुख की इच्छा रखने वाले इस व्रत को अवश्य करे। इसके महात्मा को सुनने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है और इस लोक में संतान सुख भोगकर परलोक में स्वर्ग को प्राप्त होता है। बोलो विष्णु भगवान की जय हो बंधुओं पुत्रदा एकादशी का व्रत साल में दो बार आता है।एक पोश मास में और दूसरा सावन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को बंद हो।जो कोई भी।पुत्रदा एकादशी का व्रत करता है।

उनके सभी पापों का नाश होता है साथ ही उनके सभी मुराद होते हैं इसलिए बंधु हर किसी को पुत्रदा एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए। बंधु पुत्रदा एकादशी का व्रत करने वाले को सभी पौष्टिक सुखों की प्राप्ति होती है और साथ ही अंत में मोक्ष के द्वार उनके लिए खुल जाते हैं जो पुत्रदा एकादशी का व्रत करते हैं।बंधुओं और उनके कई प्रकार के ग्रह दोष भी दूर हो जाते हैं जो पुत्रदा एकादशी का व्रत करते हैं। साथ ही सभी के दांपत्य जीवन में भी खुशहाली आती है जो पुत्रदा एकादशी का व्रत करते हैं।

बंधो पुत्रदा एकादशी के दिन प्रातःकाल जल्दी उठें श्रांत आदि से निवृत्त होकर।भगवान विष्णु के समक्ष खड़े होकर दाहिने हाथ में जल और फूले और।एकादशी व्रत का संकल्प लें। हे भगवान विष्णु मैं आज पुत्रदा एकादशी व्रत कर रहा हूँ या कर रही हूँ जो आप की इच्छा हो वह भगवान विष्णु के समक्ष कहे, मेरी मनोकामना पूरी करे और मेरा व्रत बिना किसी भी गन बाधा के संपन्न करे। ऐसा कहकर भगवान विष्णु के समक्ष जल छोड़ दें फिर भगवान विष्णु उपचार पूजा करें। भगवान विष्णु को।तुलसी दल अस्तित्व करें, फल अर्पित करें, फूल अर्पित करें और पुत्रदा एकादशी व्रत की कथा सुनी।

फिर भगवान विष्णु की आरती उतारें। सारा दिन भगवान विष्णु के नाम जाप में बिताए। भगवान विष्णु की कथा सुने श्रीमद्भागवत गीता सुनें गजेंद्रमोक्ष सुनें नारायण कवर सुने ऐसा करते हुए ही सारा दिन बिताए और।आप भोजन में फलाहारी ही रहे।या फिर आप कुट्टू के आटे की रोटी बनाकर खा सकते हैं। कुट्टू के आटे के पकौड़े भी खा सकते हैं।यदि आपने नमक नहीं खाना तब आप फलाहार ही ग्रहण करें। दूध, चाय, फल कुछ भी ग्रहण कर सकते हैं।सूखे मेवे भी ग्रहण कर सकते हैं।

बंद हो।रात को भगवान विष्णु के समक्ष शुद्ध देसी घी का दीपक जलाये और भजन कीर्तन करें। इसी प्रकार सारी रात जागरण करें। सुबह जल्दी उठें।शान आदि से निवृत्त होकर।भगवान विष्णु की फिर से पूजा करें और किसी ब्राह्मण को भोजन कराएं, उसके बाद ही व्रत का पालन करें।ऐसा करने से आपके सभी मनोरथ शीघ्र अति भगवान विष्णु की कृपा से पूर्ण होंगे।

पुत्रदा एकादशी के दिन मांस आहार का प्रयोग ना करें, शराब का प्रयोग भी ना करें।बड़ो का इज्जत मान करें। जो कोई भी इन नियमों का पालन करते हुए एक आंशिक का व्रत करते हैं, भगवान विष्णु की उन पर कृपा बरसती है।बंद हो। यदि आपको Putrada Ekadashi Vrat Katha पसंद आये तो इसे लाइक करने के साथ साथ शेर अवश्य करना धन्यवाद राधे राधे जय श्रीकृष्णा बोलो विष्णु भगवान की जय लक्ष्मी माता की जय।

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