Monday vrat katha : सोमवार के व्रत में जरूर सुनें ये कथा

Monday vrat katha : सोमवार के व्रत में जरूर सुनें ये कथा पूरी होगी आपकी सभी मनोकामनाये “Somvar vrat katha” ओम नमः शिवाय सोमवार के दिन जो भी भक्त सच्चे मन से भगवान शिव की पूजा करता है और व्रत की कथा बढ़ता है अथवा सुनता है और दूसरों को सुनाता है, भोलेनाथ की कृपा से उनकी सभी इच्छाएं पूर्ण होती है। तो आज में आप सभी को भगवान शिव की कथा। साथ ही चालीसा और सबसे अंत में आरती भी भी आपको इस पोस्ट में पढ़ने को मिलेगा ।

Monday vrat katha : सोमवार व्रत

Somvar Vrat Katha : पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन समय की बात है। एक गांव में एक साहूकार रहा करता था। साहूकार धनी था, उसके पास अथाह धन दौलत थी, लेकिन उसकी कोई संतान नहीं थी। साहूकार भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिये सोमवार को व्रत रखा करता था और व्रत के दौरान वह विधिपूर्वक भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा और शाम को प्रदोष काल के समय शिवलिंग पर दीपक भी जल आता था।

साहूकार की भक्ति और पूजा अर्चना को देखकरदिन माता पार्वती ने भगवान शिव से कहा कि हे प्रभु यह साहूकार तो आपका परम भक्त हैं, हर सोमवार को विधि विधान से आपकी पूजा करता है। मुझे लगता है की आपको उसकी मनोकामना अवश्य पूर्ण करनी चाहिए।

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तब भगवान शिव ने देवी पार्वती की बात सुनकर कहा की हे गौरी ये संसार एक कर्मक्षेत्र है। जैसे एक किसान अपने खेत में बीज बोता है तो कुछ समय बाद उसे पेड़ मिलता है ठीक उसी तरह इस संसार में आदमी जैसा भी कर्म करता है।तो उसे उसका फल भी वैसा ही मिलता है। लेकिन माता पार्वती ने भोले भंडारी से दोबारा आग्रह किया और कहा हे नाथ फिर भी आप इसकी मनोकामना को पूर्ण कर दीजिये क्योंकि ये आप का परम भक्त हैं और अगर आप ही अपने भक्तों की इच्छा को पूर्ण नहीं करेंगे तो फिर भला भक्त आपकी पूजा आराधना क्यों करेंगे?

माता पार्वती के इतना आग्रह करने पर भगवान शिव ने कहा देवी ये धनवान साहुकार है और इसका कोई भी पुत्र नहीं है इसीलिए ये सदैव चिंतित रहता है। हालांकि इसके भाग्य में किसी संतान का योग नहीं हैं, परंतु आपके आग्रह करने पर मैं शिव पुत्र प्राप्ति का वरदान देता हूँ, लेकिन इसका पुत्र केवल 12 साल तक ही जीवित रहेगा।

मैं इससे ज्यादा कुछ नहीं कर सकता हूँ। फिर एक रात भगवान शिव ने साहूकार को स्वप्न में दर्शन दिए।और कहा की उसे जल्दी ही पुत्र की प्राप्ति होगी, लेकिन उसका पुत्र दीर्घायु नहीं बल्कि केवल 12 वर्ष तक ही जीवित रह पायेगा। ये बात सुनकर साहूकार ना तो प्रसन्न हुआ और ना ही ज्यादा दुखी हुआ। स्वप्न में सब कुछ जानने के बाद भी साहूकार ने पूजा अर्चना जारी रखी और कुछ दिनों बाद साहूकार की पत्नी गर्भवती हो गई और उसने एक सुंदर बालक को जन्म दिया।

बालक के जन्म से घर पर हर्षोल्लास का माहौल था, लेकिन साहूकार खुश नहीं था।क्योंकि उसे पता था कि उसके बालक का जीवन केवल 12 वर्ष तक का ही है और उसने किसी को भी ये बात नहीं बताई थी। जब वह बालक 11 वर्ष का हुआ तो साहूकार की पत्नी ने बालक के विवाह की बात साहूकार से कहीं, लेकिन साहूकार ने इस बात से इनकार कर दिया और उसे शिक्षा के लिए काशी भेज दिया।

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साहूकार ने बालक के मामा को बुलाया और पैसे देकर उन्हें बालक के साथ काशी जाने का आदेश दिया। साहूकार ने मामा भांजी से कहा कि वह काशी जाते समयरास्ते में यज्ञ कराते हुए और ब्राह्मणों को भोजन कराते हुए जाए। दोनों मामा भांजी ने ऐसा ही किया। काशी जाते समय जिंस रास्ते से मामा भांजे गुजर रहे थे। उसका राजा अपनी पुत्री का विवाह एक ऐसे राजकुमार से करवा रहा था जो काना था। उधर दूल्हे का पिता इस बात से चिंतित था की अगर दुल्हन पक्ष को पता चल गया तो राजकुमारी विवाह के लिए मना कर देगी।

इसलिए उसने जब साहूकार के पुत्र को देखा तो उसने सोचा की मैं अपने बालक के स्थान परके समय इस बालक को बिठा दूंगा और दुल्हन के पक्ष वालों को पता भी नहीं चलेगा। दूल्हे के पिता ने साहूकार के पुत्र को इस बात के लिए तैयार किया और वह बालक तैयार हो गया। इस तरह उस बालक ने दूल्हे के कपड़े पहन लिए और घोड़ी पर चढ़कर तोरण की रस्म को पूरा किया। तोरण के बाद जब फेरों की बारी आयी तो दूल्हे के पिता ने फिर साहूकार के पुत्र से अनुरोध किया कि वह दुल्हन के साथ फेरे भी ले लें ताकि विवाह संपन्न हो सकें।

और ये बात छुपी रहे। मामा राजी हो गए और विवाह समारोह भी संपन्न हो गया। विवाह संपन्न होने के बाद मामा भांजा काशी के लिए प्रस्थान कर गए। परंतु साहूकार के पुत्र ने दुल्हन के कपड़ों पर लिख दिया की तुम्हारा विवाह तो मुझसे हुआ है लेकिन तुम जिसके साथ विदा किया जाओगी, वह एक आंख वाला आदमी है और मैं काशी शिक्षा ग्रहण करने जा रहा हूँ। जब राजकुमारी ने ये बात पढ़ी तो उसने राजकुमार के साथ जाने से इनकार कर दिया।और अपने पिता से कहा की ये मेरा पति नहीं है। मेरे पति शिक्षा ग्रहण करने काशी गए हुए हैं।

जब सब जगह ये बात फैल गई तो मजबूरी में दूल्हे के पिता ने सारी बात सच बता दी और दुल्हन के पिता ने फिर बेटी को भेजने से इनकार कर दिया। इधर मामा भांजी दोनों काशी पहुँच गई और बालक शिक्षा ग्रहण करने लगा। तब मामा ने यज्ञ करना शुरू कर दिया। जब साहूकार का पुत्र 12 वर्ष का हुआ तब 1 दिन उसने अपने मामा जी कहाँउसकी तबियत ठीक नहीं है और वह सोने के लिए अंदर जा रहा है।

साहूकार का पुत्र अंदर सोने के लिए कमरे में गया तो उसकी मृत्यु हो गई। थोड़ी देर के बाद जब मामा अंदर पहुंची तो उन्होंने बालक को मृत अवस्था में देखा और बहुत दुखी हुई परंतु वह रो नहीं सकते थे वरना उनका यज्ञ अधूरा रह जाता। इसलिए मामा वापस आकर यज्ञ करने लगे और यज्ञ पूरा करने के बाद और ब्राह्मणों को भोजन कराने के बाद मामा अपने मृत भांजे को देखकरकरने लगे। ठीक उसी समय उसी मार्ग से भगवान शिव और देवी पार्वती जी जा रहे थे। माता पार्वती ने किसी के रोने की करुण आवाज सुनी तो भगवान शिव से कहने लगी की ये प्रभु कोई मनुष्य हो रहा है। चलिए उसके दुख को दूर करते हैं।

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तब भगवान शिव और देवी पार्वती मामा के पास गई और उन्होंने जब मृत बालक को देखा तो हैरान रह गए, क्योंकि वह भगवान शिव के आशीर्वाद से जन्मा साहूकार का पुत्र था।माता पार्वती ने कहा हे नाथ ये तो साहूकार का पुत्र है, जिसे आपने केवल 12 वर्ष तक ही जीवन जीने का वरदान दिया था, इसलिए आज 12 वर्ष की आयु पूरी होने पर वे मृत्युलोक को चला गया।देवी पार्वती ने मृत बालक को देखा तो उन्हें दया आ गई और भगवान शिव से हाथ जोड़कर कहने लगी

हे प्रभु आप बस एक बार इस बालक को जीवनदान दे दीजिए, वरना इसके माता पिता जीते जी मर जाएंगे। माता पार्वती के कई बार आग्रह करने पर भगवान शिव ने उनकी बात मान ली और उस बालक को जीवनदान दे दिया। साहूकार का पुत्र जीवित हो गया और मामा भांजे अपने घर की ओर प्रस्थान कर गई।

रास्ते में साहूकार का पुत्र उसी शहर से गुजरा।जहाँ उसका विवाह हुआ था। दुल्हन के पिता ने बालक को पहचान लिया और मामा भांजी को लेकर महल में आ गए। फिर दुल्हन के पिता ने एक समारोह किया और अपनी पुत्री को धूमधाम से साहूकार के पुत्र के साथ भेज दिया। उधर जब साहूकार का बालक अपनी पत्नी के साथ घर पहुंचा तो उसके माता पिता अंदर कमरे में बंद होकर बैठे हुए थे। वो सोच रहे थे की अगर उनका पुत्र सही सलामत वापस नहीं लौटा तो वो भूख प्यास से अपनी जान दे देंगे।तभी बालक के मामा ने कमरे के बाहर आकर उन्हें बताया कि उनका पुत्र जीवित और विवाह करके वापस आ गया है।

साहूकार ने बालक को जीवित देखा तो खुशी से उसका स्वागत किया और साहूकार का परिवार इस प्रकार खुशी खुशी जीवन बिताने लगा। ये सब भगवान शिव की कृपा और सोमवार व्रत का ही प्रभाव था कि साहूकार का पुत्र अल्पायु होने के बाद भी दीर्घायु को प्राप्त हुआ। इस प्रकार जो भी भक्त सच्चे मन से भगवान शिव की पूजा करके आज के दिन इस कथा को पड़ता है अथवा सुनता है और दूसरों को सुनाता है।भगवान शिव उनके सभी दुख दूर करते हैं, उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।

जय माता पार्बती भोले शंकर

निष्कर्ष :

सोमवार व्रत कथा “Monday vrat katha यह कथा हमें सिखाती है कि कर्म महत्वपूर्ण हैं और भगवान का आशीर्वाद केवल उन्हें मिलता है जो निस्वार्थ भाव से काम करते हैं और भगवान में विश्वास रखते हैं। इसके अलावा, यह हमें यह भी दिखाता है कि ईश्वर की कृपा से मानव जीवन को बदला जा सकता है, भले ही व्यक्ति को किसी भी प्रकार का संघर्ष करना पड़ रहा हो।

सोमवार व्रत कथा : FAQs

प्रश्न: किस गांव में साहूकार रहता था और उसकी क्या समस्या थी?

उत्तर: साहूकार एक गांव में रहता था और उसकी कोई संतान नहीं थी।

प्रश्न: साहूकार ने किन दिनों को व्रत रखा करते थे और उनका व्रत कैसे होता था?

उत्तर: साहूकार सोमवार को व्रत रखा करते थे, और उनका व्रत भगवान शिव की पूजा, दीपक जलाने, और प्रदोष काल में शिवलिंग पर दीपक जलाने के साथ मनाया जाता था।

प्रश्न: माता पार्वती ने किस विशेष बात की मांग की और भगवान शिव का क्या उत्तर था?

उत्तर: माता पार्वती ने मांग की कि साहूकार की मनोकामना पूरी होनी चाहिए। भगवान शिव ने कहा कि साहूकार को एक पुत्र प्राप्त होगा, लेकिन वो केवल 12 वर्ष तक ही जीवित रहेगा।

प्रश्न: साहूकार के पुत्र के जीवन में क्या हुआ जब वह 12 वर्ष का हुआ?

उत्तर: साहूकार के पुत्र का जीवन 12 वर्ष के बाद समाप्त हो गया, जब उसकी मृत्यु हो गई।

प्रश्न: इस कथा के कैसे भगवान शिव की कृपा और सोमवार व्रत का प्रभाव दिखाया गया?

उत्तर: इस कथा में भगवान शिव की कृपा से साहूकार के पुत्र को जीवित किया गया और उनकी मनोकामनाएं पूरी हुईं। यह दिखाता है कि सोमवार व्रत का पालन करने वाले भक्तों पर भगवान शिव की आशीर्वाद होती है और उनकी समस्याओं का समाधान होता है।

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