Durga Saptashati Path In Hindi : सम्पूर्ण दुर्गा सप्तशती पाठ

Durga Saptashati Path In Hindi- दुर्गा सप्तशती, जिन्हें चंडी पाठ या दुर्गा सप्तशती का पाठ भी कहा जाता है, एक प्रमुख हिन्दू पौराणिक ग्रंथ है जिसमें देवी दुर्गा की महिमा, महाकाव्यत्मक कथाएँ और मन्त्रों का संग्रह है। यह 700 श्लोकों से मिलकर बना है जो मार्कण्डेय पुराण के माध्यम से प्राप्त हुए हैं। यह पाठ नवरात्रि के अवसर पर विशेष भक्ति और श्रद्धा के साथ किया जाता है।

दुर्गा सप्तशती का पाठ तीन खंडों में बाँटा जा सकता है: प्रथम खंड (आदि कांड), मध्यम खंड (मध्य कांड) और उत्तर खंड (उपासना कांड)। प्रत्येक खंड में विभिन्न अध्याय होते हैं जिनमें मां दुर्गा की महिमा, विजय कथाएँ, और उनके महाकाव्यत्मक रूपों का वर्णन होता है।

दुर्गा सप्तशती का पाठ करने से श्रद्धालु को शक्ति और साहस मिलता है, और उन्हें सभी प्रकार के अशुभ और दुश्मनों से रक्षा की प्राप्ति होती है। इस पाठ को नियमित रूप से करने से भक्त के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि की प्राप्ति होती है।

यदि आप दुर्गा सप्तशती का पाठ करने का विचार कर रहे हैं, तो यह आपके जीवन में पौराणिक शक्ति और सकारात्मकता का आभास करा सकता है। आपको इसे श्रद्धापूर्वक, ध्यानपूर्वक और समर्पण से करना चाहिए।

यह भी पढ़े :
सोमवार व्रत करने से भगवान शिव की होगी विशेष लाभ।
सोलह सोमवार व्रत कथा
सावन व्रत कथा के महिमा
हरतालिका तीज व्रत, कथा, पूजा विधि, मुहूर्त 2023
रविवार व्रत कथा

Durga Saptashati Path In Hindi : सम्पूर्ण दुर्गा सप्तशती पाठ

मां दुर्गा के पावन रूप की उपासना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा “दुर्गा सप्तशती पाठ” है। यह पाठ मां दुर्गा की महिमा, शक्तियाँ, और कथाएँ प्रस्तुत करता है और उनकी आराधना का एक अद्वितीय तरीका प्रदान करता है। इस लेख में, हम दुर्गा सप्तशती पाठ की महत्वपूर्ण बिंदुओं को देखेंगे और जानेंगे कि इसका पाठ कैसे किया जाता है और इसके लाभ क्या हैं।

Durga Saptashati Path In Hindi

 श्री सप्तश्लोकी दुर्गा

शिवजी बोले – हे देवि! तुम भक्तों के लिये सुलभ हो और समस्त कर्मों का करनेवाली हो। कलियुग में कामनाओं की सिद्धि हेतु यदि कोई उपाय तो उसे अपनी वाणी द्वारा सम्यक् रूप से व्यक्त करो।

देवी ने कहा – हे देव! आपका मेरे ऊपर बहुत स्नेह है। कलियुग में समस्त सिद्ध करने वाला जो साधन है वह बतलाऊँगी, सुनो ! उसका नाम ‘अम्बास्तुति’।

ॐ इस दुर्गासप्तश्लोकी स्तोत्रमन्त्रके नारायण ऋषि हैं, अनुष्टुप् छन्द है, श्रीमहाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती देवता हैं, श्रीदुर्गाकी प्रसन्नता के लिये सप्तश्लोकी दुर्गापाठ में इसका विनियोग किया जाता है। वे भगवती महामाया देवी ज्ञानियोंके भी चित्तको बलपूर्वक खींचकर मोहमें डाल देती हैं ॥ १ ॥

माँ दुर्गे! आप स्मरण करनेपर सब प्राणियों का भय हर लेती हैं और स्वस्थ पुरुषों द्वारा चिन्तन करने पर उन्हें परम कल्याणमयी बुद्धि प्रदान करती हैं। दुःख, दरिद्रता और भय हरने वाली देवि! आपके सिवा दूसरी कौन है, जिसका चित्त सबका उपकार करने के लिये सदा ही दयार्द्र रहता हो ॥२॥

नारायणी ! तुम सब प्रकार का मंगल प्रदान करने वाली मंगलमयी हो। कल्याणदायिनी शिवा हो। सब पुरुषार्थों को सिद्ध करने वाली, शरणागत वत्सला, तीन नेत्रोंवाली एवं गौरी हो । तुम्हें नमस्कार है ॥ ३ ॥

शरण में आये हुए दीनों एवं पीड़ितों की रक्षा में संलग्न रहने वाली तथा सबकी पीड़ा दूर करने वाली नारायणी देवि! तुम्हें नमस्कार है ॥ ४ ॥

सर्वस्वरूपा, सर्वेश्वरी तथा सब प्रकार की शक्तियों से सम्पन्न दिव्यरूपा दुर्गे! देवि सब भयों से हमारी रक्षा करो; तुम्हें नमस्कार है ॥ ५ ॥

देवि! तुम प्रसन्न होने पर सब रोगों को नष्ट कर देती हो और कुपित होने पर मनोवांछित सभी कामनाओं का नाश कर देती हो। जो लोग तुम्हारी शरण में जा चुके हैं, उन पर विपत्ति तो आती ही नहीं। तुम्हारी शरण में गये हुए मनुष्य शरण देने वाले हो जाते हैं ॥ ६ ॥

सर्वेश्वरि! तुम इसी प्रकार तीनों लोकों की समस्त बाधाओं को शान्त करो और हमारे शत्रुओं का नाश करती रहो॥७॥

॥ श्रीसप्तश्लोकी दुर्गा सम्पूर्ण ॥

श्रीदुर्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम्

माँ दुर्गा के 108 नाम

सती, साध्वी, भवप्रीता, भवानी, भवमोचनी, आर्या, दुर्गा, जया, आद्या, त्रिनेत्रा, शूलधारिणी, पिनाकधारिणी, चित्रा, चंद्रघंटा, महातपा, मन, बुद्धि, अहंकारा, चित्तरूपा, चिता, चिति, सर्वमंत्रमयी, सत्ता, सत्यानंदस्वरुपिणी, अनंता, भाविनी, भव्या, अभव्या, सदागति, शाम्भवी, देवमाता, चिंता, रत्नप्रिया, सर्वविद्या, दक्षकन्या, दक्षयज्ञविनाशिनी, अपर्णा, अनेकवर्णा, पाटला, पाटलावती, पट्टाम्बरपरिधाना, कलमंजरीरंजिनी, अमेयविक्रमा, क्रूरा, सुंदरी, सुरसुंदरी, वनदुर्गा, मातंगी, मतंगमुनिपूजिता, ब्राह्मी, माहेश्वरी, ऐंद्री, कौमारी, वैष्णवी, चामुंडा, वाराही, लक्ष्मी, पुरुषाकृति, विमला, उत्कर्षिनी, ज्ञाना, क्रिया, नित्या, बुद्धिदा, बहुला, बहुलप्रिया, सर्ववाहनवाहना, निशुंभशुंभहननी, महिषासुरमर्दिनी, मधुकैटभहंत्री, चंडमुंडविनाशिनी, सर्वसुरविनाशा, सर्वदानवघातिनी, सर्वशास्त्रमयी, सत्या, सर्वास्त्रधारिणी, अनेकशस्त्रहस्ता, अनेकास्त्रधारिणी, कुमारी, एककन्या, कैशोरी, युवती, यति, अप्रौढ़ा, प्रौढ़ा, वृद्धमाता, बलप्रदा, महोदरी, मुक्तकेशी, घोररूपा, महाबला, अग्निज्वाला, रौद्रमुखी, कालरात्रि, तपस्विनी, नारायणी, भद्रकाली, विष्णुमाया, जलोदरी, शिवदुती, कराली, अनंता, परमेश्वरी, कात्यायनी, सावित्री, प्रत्यक्षा और ब्रह्मावादिनी।

देवी पार्वती! जो प्रतिदिन दुर्गा जी के इस अष्टोत्तरशतनाम का पाठ करता है, उसके लिये तीनों लोकों में कुछ भी असाध्य नहीं है ॥ १६ ॥

वह धन, धान्य, पुत्र, स्त्री, घोड़ा, हाथी, धर्म आदि चार पुरुषार्थ तथा अन्त में सनातन मुक्ति भी प्राप्त कर लेता है॥१७॥ 

कुमारी का पूजन और देवी सुरेश्वरी का ध्यान करके पराभक्ति के साथ उनका पूजन करे, फिर अष्टोत्तरशतपाठ आरम्भ करे ॥ १८ ॥ 

देवि ! जो ऐसा करता है, उसे सब श्रेष्ठ देवताओं से भी सिद्धि प्राप्त होती है। राजा उसके दास हो जाते हैं। वह राज्य  लक्ष्मी प्राप्त कर लेता है ॥ १९ ॥ 

गोरोचन, लाक्षा, कुंकुम, सिन्दूर, , घी (अथवा दूध), चीनी और मधु — इन वस्तुओं को एकत्र करके इनसे विधि पूर्वक यन्त्र लिखकर जो विधिज्ञ पुरुष सदा उस यन्त्र को धारण करता है, वह शिव के तुल्य (मोक्षरूप) हो जाता है ॥ २० ॥

भौमवती अमावास्या की आधी रात में, जब चन्द्रमा शतभिषा नक्षत्र पर हों, उस समय इस स्तोत्र को लिखकर जो इसका पाठ करता है, वह सम्पत्तिशाली होता है ॥ २१ ॥

श्री दुर्गा सप्तशती पाठ का सही विधि विधान

दुर्गा सप्तशती पाठ— अद्भुत शक्तियां प्रदान करता है-

नवरात्री के दौरान माता को प्रसन्न करने के लिए साधक विभिन्न प्रकार के पूजन करते हैं जिनसे माता प्रसन्न उन्हें अद्भुत शक्तियां प्रदान करती हैं। ऐसा माना जाता है कि यदि नवरात्र में दुर्गा सप्तशती का नियमित पाठ विधि विधान से किया जाए तो माता बहुत प्रसन्न होती हैं। दुर्गा सप्तशती में (700) सात सौ प्रयोग है, जो इस प्रकार है:-

मारण के 90, मोहन के 90, उच्चाटन के दोसौ (200), स्तंभन के दोसौ (200), विद्वेषण के साठ (60) और वशीकरण के साठ (60)। इसी कारण इसे सप्तशती कहा जाता है। 

दुर्गा सप्तशती पाठ विधि-

  • सर्वप्रथम साधक को स्नान कर शुद्ध हो जाना चाहिए।
  • तत्पश्चात वह आसन शुद्धि की क्रिया कर आसन पर बैठ जाए।
  • माथे पर अपनी पसंद के अनुसार भस्म, चंदन अथवा रोली लगा लें।
  • शिखा बाँध लें, फिर पूर्वाभिमुख होकर चार बार आचमन करें।
  • इसके बाद प्राणायाम करके गणेश आदि देवताओं एवं गुरुजनों को प्रणाम करें, फिर पवित्रेस्थो वैष्णव्यौ इत्यादि मन्त्र से कुश की पवित्री धारण करके हाथ में लाल फूल, अक्षत और जल लेकर देवी को अर्पित करें तथा मंत्रों से संकल्प लें।
  • देवी का ध्यान करते हुए पंचोपचार विधि से पुस्तक की पूजा करें।
  • फिर मूल नवार्ण मन्त्र से पीठ आदि में आधारशक्ति की स्थापना करके उसके ऊपर पुस्तक को विराजमान करें। इसके बाद शापोद्धार करना चाहिए।
  • इसके बाद उत्कीलन मन्त्र का जाप किया जाता है। इसका जप आदि और अन्त में इक्कीस-इक्कीस बार होता है।
  • इसके जप के पश्चात् मृतसंजीवनी विद्या का जाप करना चाहिए।
  • तत्पश्चात पूरे ध्यान के साथ माता दुर्गा का स्मरण करते हुए दुर्गा सप्तशती पाठ करने से सभी प्रकार की मनोकामनाएँ पूरी हो जाती हैं।

श्री दुर्गा सप्तशती पाठ (Durga Saptashati Path In Hindi)

समापन

दुर्गा सप्तशती पाठ मां दुर्गा की उपासना का एक अद्वितीय तरीका है, जो भक्तों को आत्मिक शांति और शक्ति प्रदान करता है। इस पाठ को नियमित रूप से करने से भक्त का मानसिक और आध्यात्मिक विकास होता है।

FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

1. दुर्गा सप्तशती पाठ कितनी बार किया जाना चाहिए?

आमतौर पर, दुर्गा सप्तशती पाठ को नवरात्रि के दौरान नौ दिनों तक नौ बार पाठ किया जाता है।

2. क्या यह पाठ प्रातःकाल में ही किया जा सकता है?

नहीं, दुर्गा सप्तशती पाठ को किसी भी समय कर सकते हैं, लेकिन प्रातःकाल में करने से शुभ फल मिलता है।

3. क्या इसका पाठ बिना गुरु के किया जा सकता है?

हां, आप बिना गुरु के भी दुर्गा सप्तशती पाठ कर सकते हैं, लेकिन यदि संभावना हो तो गुरु के मार्गदर्शन में करना अच्छा होता है।

4. क्या इसका पाठ व्रत के दौरान आवश्यक है?

नहीं, आप व्रत के दौरान या बिना व्रत के भी दुर्गा सप्तशती पाठ कर सकते हैं। यह आपकी भक्ति और साधना की व्यक्तिगत परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

5. क्या दुर्गा सप्तशती पाठ के बाद कुछ विशेष सावधानियाँ रखनी चाहिए?

जी हां, पाठ के बाद पानी प्रदान करने, पूजा स्थल को साफ और पवित्र रखने आदि की सावधानियाँ रखनी चाहिए।

Leave a Comment