Brihaspativar Vrat Katha : श्री बृहस्पतिवार व्रत कथा | बृहस्पतिदेव की कथा 

हेलो भक्त जनो आपसभी को आज “Brihaspativar Vrat Katha” बृहस्पतिवार व्रत कथा या इसे हम Guruvar Vrat Katha भी कहते है। तो आइये हम सभी श्री बृहस्पतिवार व्रत कथा यानि बृहस्पतिदेव की कथा (Shri Brihaspatidev Ji Vrat Katha) को पढ़ते है।

इस व्रत को करने से समस्त इच्छ‌एं पूर्ण होती है और वृहस्पति महाराज प्रसन्न होते है । धन, विघा, पुत्र तथा मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है । परिवार में सुख तथा शांति रहती है । इसलिये यह व्रत सर्वश्रेष्ठ और अतिफलदायक है । इस व्रत में केले का पूजन ही करें । कथा और पूजन के समय मन, कर्म और वचन से शुद्घ होकर मनोकामना पूर्ति के लिये वृहस्पतिदेव से प्रार्थना करनी चाहिये । दिन में एक समय ही भोजन करें । भोजन चने की दाल आदि का करें, नमक न खा‌एं, पीले वस्त्र पहनें, पीले फलों का प्रयोग करे।

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बृहस्पतिदेव कौन हैं? (Brihaspativar Vrat Katha)

बृहस्पतिदेव ग्रह विज्ञान में गुरु ग्रह के रूप में जाने जाते हैं। वे ज्योतिषीय दृष्टि से सभी ग्रहों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण माने जाते हैं। बृहस्पतिदेव जी बुद्धिमत्ता, विद्या, धर्म, और ज्ञान के प्रतीक माने जाते हैं। वे सदा अपने भक्तों के लिए सौभाग्यशाली और उनके जीवन में समृद्धि और सुख का स्रोत बनते हैं।

श्री बृहस्पतिवार व्रत कथा : (Brihaspativar Vrat Katha)

Brihaspativar Vrat Katha: इस दिन नमक नहीं खाना चाहिए।पीले रंग का फूल, चने की दाल।पीले कपड़े।तथा पीले चंदन से पूजा करनी चाहिए।पूजन के पश्चात।कथा सुननी चाहिए। इस व्रत के करने से बृहस्पति जी अति प्रसन्न होते हैं तथा धन और विद्या का लाभ होता है। इस प्रयोग के लिए ये व्रत अति आवश्यक है। इस व्रत में केले का पूजन होता है।

Brihaspativar Vrat Katha

Brihaspativar Vrat Katha, श्री बृहस्पतिवार व्रत कथा : किसी गांव में एक साहूकार रहता था, जिसके घर में अन्न, वस्त्र और धन किसी की कोई कमी नहीं थी।परन्तु उसकी इस्त्री बहुत ही कृपण थी।किसी भिक्षार्थी को कुछ नहीं देती। सारे दिन घर के कामकाज में लगी रहती।एक समय एक साधु महात्मा बृहस्पतिवार के दिन उसकी द्वार पर आये और भिक्षा की याचना की।स्त्री उस समय घर के आंगन को लिप रही थी। इस कारण साधु महाराज से कहने लगी की महाराज इस समय तो मैं घर लिप रही हूँ, आपको कुछ नहीं दे सकती। फिर किसी अवकाश के समय आना।

साधु महात्मा खाली हाथ चले गए।कुछ दिन के पश्चात वहीं साधु महाराज आये।उसी तरह भिक्षा मांगी। साहू कारनी उस समय लड़के को खिला रही थी। कहने लगी महाराज मैं क्या करूँ? अवकाश नहीं है इसलिए आपको भिक्षा नहीं दे सकती।तीसरी बार महात्मा आये।तो उसने उन्हें उसी तरह से टालना चाहा।परन्तु महात्मा जी कहने लगी कि यदि तुम को बिल्कुल ही अवकाश हो जाए तो मुझ को भिक्षा दोगी?

साहू कारनी कहने लगी की हाँ महाराज, यदि ऐसा हो जाए तो आपकी बड़ी कृपा होगी।साधु महात्मा जी कहने लगे कि अच्छा, मैं एक उपाय बताता हूँ।तुम बृहस्पतिवार को दिन चढ़ने पर उठो।और सारे घर में झाड़ू लगाकर कूड़ा एक कोने में जमा करदो, घर में चौका इत्यादि मत लगाओ, फिर स्नान आदि करके घर वालों से कहो उस दिन सब हजामत अवश्य बनवाएं।

रसोई बनाकर चूल्हे के पीछे रखा करो, सामने नहीं।सायंकाल को अंधेरा होने के बाद दीपक जलाओ तथा बृहस्पतिवार को पीले वस्त्र मत धारण करो।ना पीले रंग की चीजों का भोजन ग्रहण करो। यदि ऐसा करोगी तो तुमको घर का कोई काम नहीं करना पड़ेगा।साहू कारनी ने ऐसा ही किया।बृहस्पतिवार को दिन चढ़े उठी झाड़ू लगाकर कूड़े को घर में ही जमा कर दिया।पुरुषों ने हजामत बनवाई।

भोजन बनवाकर चूल्हे के पीछे रखा।मैं सब बृहस्पतिवार को ऐसा ही करती रहीं।अब कुछ काल बाद उसके घर में खाने को दाना ना रहा।थोड़े दिनों में महात्मा फिर आये और भिक्षा मांगी।परन्तु सेठानी ने कहा महाराज मेरे घर में खाने को अन्य नहीं है, आपको क्या दे सकती हूँ?तब महात्मा ने कहा कि जब तुम्हारे घर में सब कुछ था, तब भी तुम कुछ नहीं देती थी।अब पूरा पूरा अवकाश है।

तब भी कुछ नहीं दे रही हो।तुम क्या चाहती हो? वह कहो? तब सेठानी ने हाथ जोड़कर प्रार्थना की महाराज अब कोई ऐसा उपाय बताओ की मेरे पहले जैसा धन धान्य हो जाये।अब मैं प्रतिज्ञा करती हूँ की आप जैसा कहेंगे वैसा ही करूँगी। तब महात्मा जी ने कहा।बृहस्पतिवार को प्रातः काल उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर घर को गौ के गोबर से लिपो तथा घर के पुरुष हजामत ना बनवाये, भूखों को अन्न जल देती रहो।ठीक सायंकाल दीपक जलाओ यदि ऐसा करोगी तो तुम्हारी सब मनोकामनाएं भगवान बृहस्पति जी की कृपा से पूर्ण होंगी।

सेठानी ने ऐसा ही किया और उसके घर में धनधान्य वैसा ही हो गया जैसा कि पहले था। इस प्रकार भगवान बृहस्पति जी की कृपा से अनेक प्रकार के सुख भोगकर दीर्घकाल तक जीवित रहीं।हाँ।प्रिय भक्त जनों, आइये अब सुनते हैं बृहस्पतिवार की दूसरी कथा।1 दिन इन्द्र बड़े अहंकार से अपने सिंहासन पर बैठे थे।और बहुत से देवता, ऋषि, गंधर्व, किन्नर आदि सभी सभा में उपस्थित थे।जिससमय बृहस्पति जी वहाँ पर आये तो सब के सब उनके सम्मान के लिए खड़े हो गए परंतु इन्द्र गर्व के मारे खड़ा ना हुआ।

वे सदैव उनका आदर किया करता था।बृहस्पति जी अपना अनादर समझते हुए वहाँ से उठकर चले गए। तब इंद्र को बड़ा शोक हुआ कि देखो मैंने गुरु जी का अनादर कर दिया, मुझसे बड़ी भारी भूल हो गई।गुरूजी के आशीर्वाद से ही मुझको यह वैभव मिला है। उनकी क्रोध से यह सब नष्ट हो जाएगा। इसलिए उनके पास जाकर उनसे क्षमा मांगनी चाहिए।जिससे उनका क्रोध शांत हो जाए और मेरा कल्याण हो।

ऐसा विचार कर इंद्र उनके स्थान पर गए। जब राष्ट्रपति जी ने अपने योग बल से यह जान लिया कि इंद्र क्षमा मांगने के लिए आ रहा है तब क्रोध वर्ष उनसे भेंट करना उचित न समझकर अंतर्ध्यान हो गए। जब इंद्र ने बृहस्पतिजी को घर पर ना देखा तब निराश होकर लौट आये जब दैत्यों के राजा विश्वकर्मा को।यह समाचार विदित हुआ तो उसने अपने गुरु शुक्राचार्य की आज्ञा से इंद्रपुरी को चारों तरफ से घेर लिया।

गुरु की कृपा ना होने के कारण देवता हारने व मार खाने लगे।तब उन्होंने ब्रह्मा जी को विनयपूर्वक सब प्रशांत सुनाया और कहा की महाराज दैत्यों से किसी प्रकार हमें बचाईये तब ब्रह्मा जी कहने लगे कि तुमने बड़ा अपराध किया है, जो गुरुदेव को क्रोधित किया।अब तुम्हारा कल्याण इसी में हो सकता है। त्वष्टा ब्राह्मण का पुत्र विश्वरूपा बड़ा तपस्वी और ज्ञानी है। उसे अपना पुरोहित बनाओ तो तुम्हारा कल्याण हो सकता है।

ये वचन सुनते ही।इन्द्र दस्ता के पास गए और बड़ी विनीत भाव से तुष्टा से कहने लगे की आप हमारे पुरोहित बनिये जिससे हमारा कल्याण हो।तब त्वष्टा ने उत्तर दिया की पुरोहित बनने से तपोबल घट जाता है, परंतु तुम बहुत विनती करते हो इसलिए मेरा पुत्र विश्वरूपा पुरोहित बनकर तुम्हारी रक्षा करेगा।विश्वरूप आने पिता की आज्ञा से पुरोहित बनकर ऐसा यत्न किया की हरी इच्छा से इंद्र विश वर्मा को युद्ध में जीतकर अपने इंद्रासन पर स्थित हुआ। विश्वरूपा के तीन मुख्य थे। एक मुख से वे सोमपल्ली लता का रस निकाल पीते थे।

दूसरे मुख से वह मदिरा पीते और तीसरे मुख से अन्नादि भोजन करते इंद्र ने कुछ दिनों उपरांत कहा।की मैं आपकी कृपा से यज्ञ करना चाहता हूँ। जब विश्वरूपा की आज्ञानुसार यज्ञ प्रारंभ हो गया तब एक दैत्य ने विस्वरूपा से कहा की तुम्हारी माता देती की कन्या है। इस कारण हमारे कल्याण के निमित्त एक आहुति देती के नाम पर भी दे दीजिये तो अति उत्तम हो।विश्वरूपा उस दैत्य का कहा मानकर।आहुति देते समय देते नाम भी धीरे धीरे से लेने लगे। इसी कारण जय के करने से देवताओं का तेज नहीं बढ़ा।

इंद्र ने यह वृतांत जानते ही क्रोधित होकर विश्वरूपा के तीनों सिर काट डाले।मद्यपान करने से भरा सोमपल्ली पीने से कबूतर और अन्य खाने के मुख से तीतर बना विश्वरूपा के मरते ही इंद्र का स्वरूप ब्रह्म हत्या के प्रभाव से बदल गया। देवताओं के एक वर्ष पश्चाताप करने पर भी ब्रह्म हत्या का भी पाप न छूटा तो सब देवताओं की प्रार्थना करने पर ब्रह्मा जी बृहस्पतिजी के सहित वह आगये कुश ब्रह्म हत्या के चार भाग किये।उनमें से एक भाग पृथ्वी को दिया। इसी कारण कहीं कहीं धरती ऊंची, नीची और बीज बोने के लायक भी नहीं होती।

साथ ही ब्रह्मा जी ने यह वरदान दिया जहाँ पृथ्वी में गड्ढा होगा।कुछ समय पाकर स्वयं भर जायेगा। दूसरा वृक्षों को दिया जिससे उनमें से एक बूंद बनकर बहता है।इस कारण गूगल के अतिरिक्त सबगुन अशुद्ध समझे जाते हैं। वृक्षों को यह वरदान दिया।की ऊपर से सूख जाने पर जौ फिर फूट जाती है।तीसरा भाग स्त्रियों को दिया। इसी कारण स्त्रियाँ हर महीने रजस्वला होकर पहले दिन चाण्डालिनी दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी तीसरे दिन धोबिन के समान रहकर चौथे दिन शुद्ध होती है और संतान प्राप्ति का उनको वरदान दिया।

चौथा भाग जल को दिया, जिससे फैन और शिवलाल आदि जल के ऊपर आ जाते हैं।जल को यह वरदान मिला कि जीस चीज़ में डाला जाएगा वह बोझ में बढ़ जाएगी।इस प्रकार इंद्र को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त किया। जो मनुष्य इस कथा को पढ़ता या सुनता है उसके सब बाप बृहस्पति जी महाराज की कृपा से नष्ट होते हैं।

बृहस्पतिवार व्रत की पूजा विधि:

  1. पहले बृहस्पतिवार के दिन उठकर नहाने के बाद, श्री गणेश और लौकिक देवी-देवताओं की पूजा करें।
  2. फिर बृहस्पति देव की मूर्ति या छवि के सामने बैठें और उनकी पूजा करें।
  3. बृहस्पति देव के चालीसा या मंत्र का जाप करें।
  4. पूजा के बाद, ब्राह्मणों और गरीबों को भोजन और दान दें।
  5. अगर आपके पास एक जूप या तांबे का कलश है, तो इसे बृहस्पति देव की पूजा के लिए उपयोग करें।
  6. बृहस्पतिवार को ब्राह्मणों को भोजन और दान देना बहुत शुभ माना जाता है, और यह व्रत का महत्व और पुण्य बढ़ाता है।

बृहस्पतिवार व्रत की पूजा सामग्री:

  1. बृहस्पति देव की मूर्ति या छवि
  2. अपने पूजा स्थल के लिए पूजा वस्त्र (पारंपरिक धोती या साड़ी)
  3. दीपक और घी (ज्योति प्रज्वलित करने के लिए)
  4. पूजा के लिए फूल और पुष्पमाला
  5. बृहस्पति देव के लिए चावल, तिल, मिश्रित दाना, और दूध
  6. पूजा के लिए कलश और जल
  7. काजल, सिन्दूर, और अद्भुत (सुंदरता के लिए)
  8. बृहस्पति देव के मंत्र के पुस्तक या मंगलवार के व्रत की कथा की पुस्तक
  9. धूप और धूप दिने का समय
  10. पूजा के लिए चौकी या आसन
  11. पूजा के लिए आरती की थाली

समापन

श्री बृहस्पतिवार व्रत कथा : (Brihaspativar Vrat Katha) एक महत्वपूर्ण परंपरागत प्रथा है जो हमें आदर्श जीवन जीने का मार्ग दिखाती है। इस व्रत के द्वारा हम भगवान बृहस्पति की कृपा प्राप्त करते हैं और अपने जीवन में समृद्धि और खुशियों को आमंत्रित करते हैं। इसलिए, हम सभी को इस पवित्र व्रत का पालन करने की सलाह देते हैं और भगवान बृहस्पति की कृपा को पाने का प्रयास करने का संकल्प लेने की प्रेरणा देते हैं।

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